दिल्ली जंतर-मंतर Protest के बाद दिल्ली पुलिस ने दो लड़कों को थाने में सज़ा दी | Hindi Police Punishment Stories
सुनीता मैडम ने एक **मोटा काला लेदर स्ट्रैप** उठाया।
स्ट्रैप लगभग दो इंच चौड़ा और भारी था।
चटाक!!!
पहला वार आकाश की गाँड पर पड़ा। इतनी जोर से कि उसकी चीख निकल गई। “आआआह!!!
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दिल्ली जंतर-मंतर Protest के बाद दिल्ली पुलिस ने दो लड़कों को थाने में सज़ा दी | Hindi Police Punishment Stories
रात के लगभग साढ़े दस बज रहे थे। दिल्ली के एक व्यस्त थाने में दो लड़कों को घसीटकर लाया गया था। दोनों ने जंतर मंतर के प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस पर पत्थर फेंके थे और एक कॉन्स्टेबल को धक्का देकर गिराया था। सीसीटीवी फुटेज और गवाहों की पहचान के बाद उन्हें पकड़ लिया गया था। और बोली कि तूम दोनों लड़के थे
आकाश – २२ साल, गोरा, सामान्य कद, थोड़ा मोटा शरीर
रवी – २३ साल, सांवला, दुबला-पतला लेकिन मजबूत
थाने की महिला स्टाफ में **इंस्पेक्टर सुनीता राठौर** थीं। ३९ साल की, मोटी-तगड़ी, बहुत सख्त स्वभाव वाली महिला। उनके साथ दो महिला कांस्टेबल – रेखा और कविता – भी थीं। तीनों ने दरवाजा बंद कर लिया।
सुनीता मैडम ने दोनों को बीच में खड़ा करके देखा। उनकी आँखों में गुस्सा साफ झलक रहा था।
पुलिस पर पत्थरबाजी की? पुलिस पर हाथ उठाया? आज तुम दोनों को ऐसी सज़ा मिलेगी कि मरते दम तक याद रहेगी। पहले मुँह पर थप्पड़ और अपमान
सुनीता मैडम सबसे पहले आकाश के पास गईं।
थप्पड़!!!
बहुत जोरदार थप्पड़ उसके दाएँ गाल पर पड़ा। आकाश का चेहरा एक तरफ झुक गया। गाल तुरंत जलने लगा और लाल हो गया आह…
फिर रवी के मुँह पर दो थप्पड़ लगाए गए। दोनों के गाल जल रहे थे। आँखों में आँसू आ गए थे लेकिन वो सह रहे थे।
कपड़े उतारो। सब।” सुनीता मैडम ने आदेश दिया।
दोनों ने काँपते हाथों से कपड़े उतारने शुरू किए। शर्ट, पैंट, अंडरवियर… सब कुछ। कुछ ही देर में दोनों पूरी तरह नंगे खड़े थे। शर्म से उनके चेहरे और भी लाल हो चुके थे। कमरे की रोशनी में उनके नितंब साफ दिख रहे थे।
और अब मुर्गा पोजीशन और पहली पट्टे की सज़ा मुर्गा बनो। दोनों।
आकाश और रवी घुटनों के बल बैठ गए। हाथ कानों पर रखे, सिर नीचे किया, नितंब ऊपर तान दिए। अब दोनों की नंगी गाँड एक साथ उभरकर दिख रही थीं।
सुनीता मैडम ने एक **मोटा काला लेदर स्ट्रैप** उठाया। स्ट्रैप लगभग दो इंच चौड़ा और भारी था।
चटाक!!!
पहला वार आकाश की गाँड पर पड़ा। इतनी जोर से कि उसकी चीख निकल गई। “आआआह!!!
जलन ऐसी लगी जैसे किसी ने आग का तवा चिपका दिया हो फिर रवी पर वार पड़ा। रवी भी जोर से चीखा सुनीता मैडम बारी-बारी दोनों पर स्ट्रैप बरसाती रहीं। हर वार पर तेज़ आवाज़ गूँज रही थी। दोनों की गाँड तेजी से लाल हो रही थीं। गहरी धारियाँ बनने लगी थीं। आँसू बहने लगे थे।
गिनती करो! जोर से बोलो – ‘मैंने पुलिस पर पत्थर फेंके, मुझे सज़ा मिलनी चाहिए’!
आकाश रोते हुए बोल रहा था एक… मैंने पुलिस पर पत्थर फेंके… आआह… मुझे सज़ा मिलनी चाहिए और रवी भी काँपती आवाज़ में गिन रहा था। स्ट्रैप लगातार पड़ रहा था। लगभग चालीस-चालीस वार तक यह सिलसिला चला। दोनों की गाँड अच्छी खासी सूज चुकी थीं और चमकदार लाल हो चुकी थीं।
सुनीता मैडम ने स्ट्रैप एक तरफ रखा और टेबल की दराज से एक मोटा गोल लकड़ी का डंडा निकाला। डंडा काफी मोटा और चिकना था।
अब असली सज़ा शुरू होती है।
पहले आकाश को और आगे झुकाया गया। रेखा और कविता ने उसके हाथ और कमर मजबूती से पकड़ ली। सुनीता मैडम ने डंडा उसकी गाँड के छेद पर लगाया और धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से अंदर धकेलना शुरू किया।
आकाश की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुँह से तेज़ चीख निकली आआआह!!! निकलो… बहुत दर्द हो रहा है… आааाह!!! मत डालो…!!! डंडा अंदर जाता रहा। आकाश का पूरा शरीर तन गया। वो जोर-जोर से चिल्ला रहा था। आँसू उसकी आँखों से लगातार बह रहे थे। डंडा काफी अंदर तक चला गया। हर छोटी सी हरकत पर उसे भयंकर दर्द हो रहा था।
फिर रवी की बारी आई। रवी ने डर से सिर हिलाना शुरू कर दिया लेकिन कांस्टेबलों ने उसे कसकर पकड़ रखा। सुनीता मैडम ने उसी तरह मोटा डंडा उसकी गाँड में धकेल दिया।
रवी की चीख और भी तेज़ थी।
आआआह!!! छोड़ दो… मर जाऊँगा… आааाह!!! अब दोनों की गाँड में मोटा डंडा धंसा हुआ था। दोनों सिसक रहे थे, काँप रहे थे और लगातार माफी माँग रहे थे।
सुनीता मैडम ने एक छोटी कटोरी में मोटा नमक और पिसी हुई लाल मिर्च मिलाई। फिर दोनों की सूजी हुई लाल गाँड पर वह मिश्रण रगड़ना शुरू कर दिया। डंडा अभी भी अंदर था जैसे ही नमक-मिर्च लगा, दोनों पागलों की तरह चीखने लगे आकाश फर्श पर सिर पटकते हुए चिल्ला रहा था,
आआआह!!! जलन… बहुत तेज़ जलन… निकालो… आааाह!!! आग लग गई…!!!
रवी भी तड़प रहा था। उसकी आवाज़ बैठने लगी थी लेकिन वो रुक-रुक कर चीख रहा था। मिर्च की जलन डंडा होने की वजह से और भी अंदर तक फैल रही थी। दोनों के शरीर में पसीना छूट रहा था। आँसू और सिसकियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
सुनीता मैडम ने कहा, “अब और सहो। सज़ा पूरी होनी चाहिए डंडा अभी भी दोनों की गाँड में था। उन्होंने फिर से मोटा लेदर स्ट्रैप उठाया और बारी-बारी दोनों पर बरसाना शुरू कर दिया।
चटाक!!! चटाक!!! चटाक!!!
हर वार पर डंडा अंदर हिलता था और नमक-मिर्च की जलन कई गुना बढ़ जाती थी। आकाश और रवी दोनों अब पागलों की तरह चिल्ला रहे थे। उनकी चीखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। कभी-कभी उनकी आवाज़ बैठ जाती थी तो सिर्फ सिसकियाँ और भारी साँसें सुनाई देती थीं।
कांस्टेबल दोनों को मजबूती से पकड़े हुए थे। सुनीता मैडम बिना रुके मारती रहीं। हर वार के साथ दोनों की गाँड और अधिक सूज रही थी। लाल रंग अब गहरे बैंगनी में बदल चुका था। निशान साफ उभर आए थे।
लगभग बीस-पच्चीस मिनट तक यही सिलसिला चला।
दोनों लड़के पूरी तरह टूट चुके थे। उनकी चीखें अब कमजोर पड़ रही थीं लेकिन दर्द और जलन कम नहीं हुई थी आखिर में सुनीता मैडम ने रुककर डंडा दोनों की गाँड से निकाल दिया। निकालते समय दोनों ने फिर से जोरदार चीखें मारीं। नमक-मिर्च की जलन अभी भी बहुत तेज़ चल रही थी।
दोनों को उठाया गया। उनके पैर काँप रहे थे। खड़े होने की हालत नहीं थी। आकाश की आँखें सूज चुकी थीं और रवी लगातार सिसक रहा था।
सुनीता मैडम ने दोनों के सामने खड़े होकर कहा,
आज की सज़ा खत्म। लेकिन याद रखना… अगर फिर कभी पुलिस के सामने इस तरह आए तो इससे भी बुरी सज़ा मिलेगी। समझे? और हम दोनों सिर झुकाए हुए सिर्फ हामी में सिर हिला पाए। उनकी आवाज़ नहीं निकल रही थी।
कांस्टेबलों ने उन्हें कपड़े दिए। दोनों ने काँपते हाथों से कपड़े पहने।
और हर हल्की हरकत पर गाँड में तेज़ दर्द और जलन हो रही थी जब वो थाने से बाहर निकले तो दोनों लंगड़ा रहे थे। हर कदम पर दर्द की लहर दौड़ रही थी। आँखों में अभी भी आँसू थे और शरीर में कमजोरी छाई हुई थी।
उस रात दोनों घर जाकर लेटे तो भी नींद नहीं आ रही थी। गाँड की जलन और दर्द कई घंटों तक बना रहा।
फिर दो दिन के बाद...
दो दिन बाद दोपहर बाद आकाश और रवी दोनों सड़क पर जा रहे थे।
तभी एक पुलिस वैन रुकी। महिला कांस्टेबल रेखा और कविता ने उन्हें पहचान लिया तुम दोनों ही हो न? चलो, मैडम ने बुलाया है। दोनों के चेहरे फक पड़ गए। कल वाली सज़ा की जलन अभी भी हल्की-हल्की बाकी थी। लेकिन इनकार करने की हिम्मत नहीं थी। उन्हें वैन में बैठा लिया गया। वैन शहर के बाहर एक घने जंगल की तरफ बढ़ने लगी।
लगभग चालीस मिनट बाद वैन एक सुनसान जगह पर रुकी। चारों तरफ घने पेड़ थे। कोई आने-जाने वाला नहीं दिख रहा था। इंस्पेक्टर सुनीता राठौर पहले से वहाँ खड़ी थीं। उनके हाथ में वही मोटा काला लेदर स्ट्रैप था।
परसो की सज़ा याद है न?
सुनीता मैडम ने ठंडी आवाज़ में पूछा आज और अच्छी तरह याद दिलाऊँगी। क्योंकि तुम दोनों फिर रास्ते में मिल गए।
और फिर नंगा करना और मुर्गा
कपड़े उतारो। यहीं।
दोनों ने काँपते हुए कपड़े उतारे। जंगल की ठंडी हवा उनके नंगे शरीर पर लग रही थी। फिर सुनीता मैडम ने आदेश दिया मुर्गा बनो। पेड़ के सामने।
आकाश और रवी घुटनों के बल बैठ गए। हाथ कानों पर, नितंब ऊपर। दोनों की गाँड कल की सज़ा से अभी भी हल्की सूजी और लालिमा लिए हुए थीं।
स्ट्रैप से लंबी सज़ा
फिर सुनीता मैडम ने स्ट्रैप हाथ में लिया और बिना किसी वार्म-अप के मारना शुरू कर दिया।
चटाक!!!
पहला वार आकाश पर पड़ा आआआह!!!
चटाक!!!
रवी पर वार पड़ा “आआह… मैडम…!!!
स्ट्रैप की आवाज़ जंगल में गूँज रही थी। सुनीता मैडम बारी-बारी दोनों पर जोर-जोर से मार रही थीं। हर वार पहले से संवेदनशील गाँड पर पड़ रहा था इसलिए दर्द कहीं ज्यादा तेज़ लग रहा था। दोनों जोर-जोर से चीख रहे थे। आँसू बह रहे थे।
जोर से गिनो! और बोलो – ‘हमने फिर गलती की, हमें सज़ा मिलनी चाहिए’!
आकाश रोते हुए बोल रहा था एक… हमने फिर गलती की… आआह… हमें सज़ा मिलनी चाहिए ओर रवी की आवाज़ काँप रही थी। स्ट्रैप लगातार पड़ रहा था। कभी आकाश पर पांच-सात वार, फिर रवी पर। दोनों की गाँड फिर से तेजी से लाल और सूजने लगीं। गहरी धारियाँ उभर आईं।
कांस्टेबल दोनों को देख रही थीं कि कोई पोजीशन न तोड़े। सुनीता मैडम ने लगभग पचास-पचास वार दोनों पर जमा दिए। दोनों का शरीर काँप रहा था। चीखें अब बैठने लगी थीं लेकिन दर्द कम नहीं हो रहा था।
और सख्त पोजीशन
सुनीता मैडम ने कहा, अब पेड़ पकड़ो। कमर और झुकाओ।
दोनों ने एक-एक पेड़ का तना पकड़ लिया और कमर झुका दी। अब उनकी गाँड और भी तनकर बाहर निकली हुई थीं फिर स्ट्रैप चलने लगा। इस बार और जोर से।
चटाक!!! चटाक!!! चटाक!!!
हर वार पर दोनों की चीखें जंगल में गूँज रही थीं।
आकाश की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। रवी सिसक-सिसक कर रो रहा था। उनकी गाँड अब पूरी तरह सूज चुकी थीं और छूने से भी तेज़ दर्द हो रहा था। सुनीता मैडम बीच-बीच में रुककर कहतीं कल कम लगा था न? आज पूरा ले लो। फिर से स्ट्रैप बरसाने लगतीं। दोनों लड़के अब लगभग टूट चुके थे। पैर काँप रहे थे, साँस फूल रही थी और आवाज़ बैठ चुकी थी।
सज़ा का अंत
और लगभग चालीस मिनट बाद सुनीता मैडम रुकीं।
दोनों की गाँड बुरी तरह लाल-बैंगनी और सूजी हुई थीं। निशान साफ दिख रहे थे। आज की सज़ा खत्म। अगर अगली बार फिर मिले तो इससे भी बुरा होगा। समझे? दोनों सिर झुकाए सिर्फ हामी भर पाए। उनके मुँह से सिर्फ सिसकियाँ निकल रही थीं।
कांस्टेबलों ने उन्हें कपड़े दिए। दोनों ने बहुत मुश्किल से कपड़े पहने। हर हल्की हरकत पर गाँड में तेज़ दर्द हो रहा था।
वैन में वापस बैठते समय दोनों चुप थे। सिर्फ उनकी भारी साँसें और कभी-कभी सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं। जंगल की ठंडी हवा उनके जलते नितंबों पर लग रही थी और दर्द और बढ़ रहा था उस रात दोनों फिर से लेटे तो भी करवट नहीं ले पा रहे थे।
स्ट्रैप के निशान और सूजन काफी देर तक परेशान करते रहे।
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